Thursday, 15 December 2016

मेरे अलफ़ाजो के दर्द को क्या समझेंगे ये लोग,
शेर पढ़ने से पहले किताब की कीमत देखते है..असीम

Sunday, 11 December 2016

ज़मीं पे कोई अपना कहाँ मिलेगा मुझे,
मेरे हिस्से का तो आसमां भी खाली है... असीम

Saturday, 3 December 2016

कुछ खुशनुमा लिखने के लिए इस्तेमाल करूँगा किसी और का कलम,
 मेरे कलम में ग़म की स्याही के सिवा कुछ भी नहीं... असीम

Sunday, 27 November 2016

वक़्त

याद है तुम्हें वो वक्त जब मेरी आवाज़ सुनने की हर दिन तुम्हें बेचैनी रहती थी,
 और आज कई हफ्ते गुज़र जाते हैं अपनी गुफ्तगू हुए, 
तुम नहीं बदले मुझे इस बात का यकीन है,
वक़्त बदल गया जिस पर हमारा बस नहीं है....असीम...

Thursday, 24 November 2016

मैंने बयां किये जब अपने हालात उनसे,
वो सुनकर बोले वाह क्या शायरी है...असीम...
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मै अब तुझे बिलकुल नहीं सताऊंगा,
तेरी दुनिया से बहुत दूर चला जाऊंगा,
कभी भूल से जो याद आएगी तुझे मेरी,
तेरी रातो में ख्वाब बनके चला आऊंगा.... असीम....
दूरियां रखना ही बेहतर है उसे देखने के बाद,
वो ज्यादा खुश रहता है मुझसे बिछड़ने के बाद...असीम...
कितना मासूम सा दिल है इस सीने में असीम,
तोड़ने वाले को भी खुश रहने की दुआ देता है....असीम...
आवाज़ एक साथ दोनों को लगाई है मैंने 
अब देखते है पहले कौन आता है... मौत या तुम....असीम...

Monday, 21 November 2016

दूरियां रखना ही बेहतर है उसे देखने के बाद,
वो ज्यादा खुश रहता है मुझसे बिछड़ने के बाद...असीम...
कितना मासूम सा दिल है इस सीने में असीम,
तोड़ने वाले को भी खुश रहने की दुआ देता है....असीम...

Saturday, 12 November 2016

शहर दर शहर तलाश रहा हूँ एक शख्स, जो मिले, प्यार करे और ठहर जाये सिर्फ मेरे लिए,लोग मिलते है प्यार करते हैं मगर कोई ठहरता नहीं कोई नहीं..... असीम...

Sunday, 30 October 2016

असीम प्यार

घर की दहलीज पे अपनी,
जलते दीये को देखकर ऐसा लगा
जैसे ज़िन्दगी में
एक नई रोशनी आयी हो...
पास जाकर
दीये की लौ को देखा
तो उसमें
तुम्हारा अक्स नज़र आया...
जानता हूँ
वो कोई और नहीं
तुम ही हो
जो दुनिया के डर से
घर के भीतर न आ सकी
और मेरी दहलीज पे
ये दीया रौशन कर गयी...
जानता हूँ
कि तुम कहीं दूर से
इस दीये को
रोज़ देखती हो,
इसलिये कई सालों से
हर रात मैं
इस दीये में तेल डाल कर
इसे रौशन करता हूँ...
मगर आज
कई सालों बाद
महसूस हो रहा है
कि अब ज़िन्दगी
अंतिम पड़ाव पर जा रही है...
मैंने आज
दीया नहीं जलाया,
ये सोचकर
कि तुम अँधेरा देखकर
मेरी दहलीज तक आओगी
इसलिये मैंने उस दीये के पास
एक सुन्दर लिबास
और एक कागज़ के टुकड़े पर
अपना संदेश लिखा है
और घर के अन्दर
तुम्हारे आने की
राह तक रहा हूँ...
मुझे अहसास हुआ
तुम्हारे आने का,
कागज़ के टुकड़े को
उठाने का,
और धीरे-धीरे
घर के भीतर आने का...
तुम एक-एक कदम बढ़ रही हो
और मैं हर कदम पर
अपनी जाती हुयी साँसों को
रोकने की
कोशिश कर रहा हूँ...
तुम दरवाजे के पास हो
और शायद
ये मेरी आखरी साँस है...
दरवाज़ा खुलने की आहट हुयी
और कम्बख़्त मेरी साँसों ने
मेरा साथ छोड़ दिया,
तुम्हें सजे-धजे देखने की तमन्ना
तमन्ना ही रह गयी
और एक सवाल
जो हमेशा पूछना चाहा था,
वो मन में ही रह गया...
आखिर क्यों करती हो
मुझसे इतना प्यार,
"असीम" प्यार,
क्यों...

Tuesday, 11 October 2016

लोग सोते हैं कुछ अच्छे ख्वाब देखने को,
और मैं रातो को जागकर ख्वाबो का शहर ढूंढता हूँ... अमित असीम..

Thursday, 6 October 2016

जिन्दा मौत

मौत से बचने का सबसे शानदार
तरीका है,
दूसरो के दिलों में
जिन्दा रहना सीख लो.....!
ये कफन, ये जनाज़े, ये शमशान
सिर्फ बातें हैं मेरे दोस्त,
वरना मर तो इंसान
तभी जाता है, जब याद करने
वाला कोई ना हो.......असीम....

Monday, 3 October 2016

हम दोनों पर एक दूसरे की यादों का सामान तो बहुत है,
बस फ़र्क ये है कि तेरा बासी हो गया और मेरा अब भी ताज़ा है... असीम..
सनम की सूरत में मैंने, खुदा को पाया है, 
प्यार करू उसे या सज़दे में झुक जाऊ....असीम...
कुरान की आयत है या गीता का कोई पाठ है
एक अजीब सा सकूँ मिलता है तेरा नाम लेने से.... असीम...
मेरे हर दर्द की बस एक दवा है तू,
मरते में जान फूंक दे वो दुआ है तू, 
औरो की बात तो नहीं जानता पर, 
मेरे लियें तो मेरा खुदा है तू.....असीम..
एक दूसरे को अपनी जान कहने वाले, 
आज दोनों बेजान से जिया करते हैं..... असीम....
इन लम्हो की क्या बात करूँ जो कटते हैं अरसे जैसे,
वो अरसे ना जाने कहाँ गए जो कटते थे लम्हो जैसे....असीम

Sunday, 2 October 2016

ख्वाहिशे

अपनी ख्वाहिशो को पाने की दौड़ में,
तुमने ये तक ना देखा कि
तुम्हारे कदमो की नीचे
मेरी ख्वाहिशे कुचल गई..... असीम....

तेज बारिश

तेज बरसती बारिश में,
पूरी तरह भीग चुका हूँ
पूरे बदन को अहसास है
इस गीलेपन का फिर भी
पता नहीं क्यों ये अहसास
मन तक नहीं पंहुचा...
क्यों... ये तुमसे बेहतर कोई नहीं जानता... असीम...
बरसात की बूंदो में आंसू तो छुपा लेता हूँ अपने,
आँखों की लाली छुपाने का कोई तरीका तो बता....असीम...
तुम खुश होकर भी आँखों में नमी रखते हो,
मै गम में रहकर भी चेहरे पे हंसी रखता हूँ, 
तुम्हारे बारे में किसकी क्या राय है नहीं मालूम,
पर लोग कहते हैं, मै पहले से बेहतर दिखता हूँ.... असीम...

पागल पगली

कभी खुद में खुद से बाते करना, 
अकेलेपन मे यादो में खोये रहना, 
कभी खुश होना कभी खुद में सहम जाना,
मेरी ये हरकते देख, 
लोग मुझे पागल कहते हैं, 
गर तुझे पगली कहे,
तो ताज्जुब कोई बात नहीं होगी...असीम..

हसीन पल

इस लंबी सुनसान ज़िन्दगी से बेहतर,
मैं चाहता हूँ मौत के वो दो हसीन पल
जो तेरी बहो में गुज़रे.... असीम...

सफर

हम दोनों आज भी वैसे ही है,
बस सफर बदल गया है,
तुम ज़िन्दगी की दौड़ में शामिल हो गये
और मैं यादों के सफर में चल रहा हूँ....असीम....
दिल मुझे मेरा अब पत्थर सा लगने लगा है,
सोचता हूँ तराश के इसे तेरी मूरत बना लूँ.... असीम...
हिचकियों के लिये कोई पुख्ता ईलाज ढूंढ ले तू ही,
तुझे याद करने का, मेरा रोग तो लाइलाज है.... असीम....
होठो पे सिगरेट और सीने में दिल सुलगता है रात भर,
सोचता हूँ किसी दिन इस धुँए के साथ ग़म भी उड़ जाएंगे....असीम..

Saturday, 1 October 2016

सोये लफ्ज़

हर रात की तरह, मै जागा था कल रात भी
मगर लफ्ज़ सोये थे,इसीलिये कुछ लिख न सका...असीम...

Friday, 30 September 2016

अद्भुत प्रेम

कई अर्से से ना उससे कोई बात हुई ना मुलाक़ात,
कल रात अचानक उसकी ख़बर आई,
कहने लगी हम साथ जी नहीं सकते,
क्या मेरे साथ मरना चाहोगे,
मुझे कुछ समझ ना आया
 बस इतना ही पूछा मैंने...
तुम मेरे पास आओगे या मुझे आना है....असीम....

मैं+ तुम = हम

हम में से मैं निकल जाऊ
तो सिर्फ तुम बाकि रह जाते हो
और तुम निकल जाओ
तो मै बाकि रह जाता हूं
और सच कहूँ
 तो मुझे मै रहना
बिल्कुल अच्छा नहीं लगता
बाकी तुम पर छोड़ता हूँ..... असीम....

ज़िम्मेदार तुम

मेरा गुस्सा पागलपन
इसकी ज़िम्मेदार मेरी तन्हाई नहीं
तुम हो
काश तुम उस वक़्त
मुझे अपने पास रोक लेते
या चले आते मेरे साथ
सबको छोड़कर..... असीम....

तन्हा रात

फिर वही रात वही तन्हाई,
 वो ही उदासी
सुलगती सिगरेट,
हाथ में कलम और कुछ कोरे पन्ने
इन सबके बीच
दिल बहलाने को
वही तेरी यादे,
बस
और कुछ नहीं
कुछ भी नहीं.....असीम....

Thursday, 29 September 2016

अच्छी कलाकार

लोग कहते है
कि कलाकार गम में रहकर भी
चेहरे पे ख़ुशी रखता है
पर तुम्हारी आंखों में,
 मुझसे दूर होने का गम
साफ़ नज़र आता है
मैंने तो सुना था
 तुम भी
एक अच्छी कलाकार हो....असीम...

बेमेल स्वेटर

थोड़ी सी लाल ऊन लेकर
मैंने सोचा एक स्वेटर बुन लूँ ,
एक मन में आया क्यों न बाजार से खरीद लूँ,
जैसे सब खरीदते हैं...
फिर कुछ पल सोचने के बाद
मैंने मन बना लिया
कि ख़ुद ही बुनूँगा इसको मैं,
और 2 सलाईयाँ लेकर शुरू किया बुनना...
ऊन का कुछ अंदाज़ा नहीं था,
ऊन ख़त्म हो गयी और स्वेटर अभी
आधा भी नहीं था,
सोचा अगली ऊन खरीदने से पहले
क्यों न अपनों से उनकी पसंद का रंग पूछ लूँ
और उसको भी इस स्वेटर में शामिल कर लूँ,
और फिर सिलसिला शुरू हुआ सबकी पसंद के रंगों का...
मैं सबके मन को रखता हुआ
हर किसी की पसंद के रंग की ऊन लेकर
जोड़ता गया अपने स्वेटर में,
और समय आ ही गया जब मेरा स्वेटर बनकर तैयार था...
सोचा, क्यों ना इस रंग बिरंगे
सबकी पसंद के रंगो वाले स्वेटर को पहनू
और जानूँ के कैसा है ये,
यही सोच लेकर निकल पड़ा उन्हीं अपनों के पास...
जिसने भी मेरा स्वेटर देखा वो खुश तो हुआ
मगर मज़ाक बनाने के अंदाज़ में,
और बस एक ही बात बोली-
"ये बेमेल रंगो का मेल तुम्हें कैसे सूझा?"
मैंने सीधे जवाब में कह दिया-
"इसमें मेरे सब अपनों की पसंद का एक-एक रंग लगा है..."
तो जवाब आया-
"भला कोई ज़िन्दगी में सबको खुश रख पाया है क्या?"
सत्य सुनकर अजीब सा लगा, मगर
शायद वो बात कटु सत्य थी...
मैंने उस स्वेटर को ना फेंका,
ना फाड़ा, ना जलाया
बल्कि एक सबक मान कर रख दिया
एक हेंगर में टांग कर अपने कमरे में...
आज जब भी मुझसे कोई रूठता है
तो मैं उस स्वेटर को देखता हूँ
और याद कर लेता हूँ कि जब एक स्वेटर में
सबकी पसंद के रंग डालने के बाद वो बेमेल हो गया,
तो भला ज़िन्दगी में सबको खुश रखना
उस बेमेल स्वेटर को पहनकर
अपना ही मज़ाक बनवाने से ज़्यादा
कुछ नहीं है,
कुछ भी नहीं है…

-अमित असीम

Wednesday, 28 September 2016

खूबसूरत मौत

तुम्हारी हंसी मेरे कानो में पड़ रही थी
सहला रही थी तुम
अपनी नर्म उंगलियों से मेरा सर
एक टक तुम्हारा मुझे देखना
सच में
मुझे पागल किये दे रहा था
और उस पर तुम्हारा
मुझे कस कर बाँहों में इस तरह भर लेना
कि हवा भी ना गुज़र सके हमारे बीच से
मेरे होठो पर तुम्हारे होंठ
और नाक इस तरह सटी हुई थी
कि जो साँसे मैं ले रहा था
वो तुम्हारे अंदर से ही
निकल रही थी
अदभुत सा था वो लम्हा
जिसमें कैद हो जाना चाह्ता था मै
हमेशा के लिये
एक ही सोच चल रही थी मन में
काश के कभी सुबह ना हो
और मैं इसी ख्वाब में जी लू
अपनी बाकि ज़िन्दगी
या फिर तुम्हारी बाँहो में ही
दम तोड़ दूँ और पा जाऊ
एक खूबसूरत मौत....असीम.....

सपने और अपने

कितनी अजीब सी बात है
जिन सपनो के पीछे हम भागते है
वो पूरा होने के बाद
एक बड़ी भीड़ हमारे साथ होती है
मगर वो नहीं होते
जिनके लिए हमने वो सपने पूरे किये
इसलिए समझ नहीं पाता हूँ
कि सपनो को छोड़ दूँ या अपनों को...असीम..

नींद की साज़िश

सुनो! सुनो ना
क्या सुन पा रहे हो मुझे
हम्म्म्म्म
बहुत रात हो चुकी है
लगता तुम भी सो गए हो
शायद औरो की तरह
तुम जान चुके हो
के रातो को जागना
मेरी आदत बन चुकी है
मै जानता हूँ
ये आदत बुरी है
लेकिन तुम तो कहते थे
कि मेरी हर आदत में शामिल रहोगे
चाहें वो बुरी ही क्यों ना हो
फिर आज अचानक कैसे
नींद आ गई तुम्हे
लगता है
औरो की तरह
ये नींद भी
मुझे तुमसे अलग करने की
साज़िश कर रही है.....असीम....⁠⁠⁠⁠

चाँद से वादा

मै रोज़ की तरह
इंतज़ार कर रहा था
चाँद के आने का,आज चाँद बड़ा हताश दिखा
मैंने जब इसका कारण पूछा तो
चाँद ने मुझसे बस इतना ही कहा
कि मैंने तुमसे जो कल वादा किया था
वो पूरा नहीं कर पाया
नहीं ला पाया उसका मुस्कुराता चेहरा
तुम्हारे लिए, ये मत सोचना के मैंने कोशिश नहीं की
काश मुझे मालूम होता
कि बदले में वो तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा मांग बैठेगी
तो कभी तुमसे ये वादा ना करता
सच में बड़े ज़िद्दी हो तुम दोनों
एक दूसरे को मुस्कुराता तो देखना चाहते हो
मगर पहल कोई नहीं करना चाहता
अब मैं इसे प्यार कहूँ या.........
मुझे भी नहीं पता क्योंकि
21वी सदी में तुम दोनों के अलावा
मै किसी के प्यार का माध्यम नहीं हूं
और एक वादा तुम दोनों से लेना है
की जब भी तुम एक हो जाओगे
तो मुझे मत भूल जाना
आज अकेले अकेले मुझको देखा करते हो
कल साथ रहकर भी देखने आना
मेरी चाँदनी में तुम्हारा प्यार
और खिल उठेगा...
ये सुनकर
मैने बिना तुमसे पूछे
दोनों की तरफ से चाँद से वादा कर दिया है
मैंने कुछ गलत तो नहीं किया ना
अगर गलत लगे तो चुपके से बतला देना
मैं चाँद को मना लूंगा तुम्हारे लिए
सिर्फ तुम्हारे लिये......... असीम....

सफ़र

एक सफ़र ऐसा हो ,
जिसकी कोई मंज़िल ना हो
कोसों लंबा सफ़र
कभी ना खत्म होने वाला
मीलो मील चलने वाला
दिन को रात और
रात को दिन में बदलते देखने वाला
जवानी को बुढ़ापे में
बदलते देखता सफ़र
अच्छे बुरे  वक़्त को
महसूस करने वाला
ख़ुशी और ग़मो से कटता सफ़र
मैं ज़िंदगी भर इस सफ़र में
चलने को तैयार हूँ
लेकिन फिर भी थमा हूँ
शायद अकेला जाने से डरता हूँ
गर तुम हाथ थाम लो
तो कल ही निकल पडू मै
इस कभी ना खत्म होने वाले सफ़र पर.... .....असीम