Thursday, 29 September 2016

बेमेल स्वेटर

थोड़ी सी लाल ऊन लेकर
मैंने सोचा एक स्वेटर बुन लूँ ,
एक मन में आया क्यों न बाजार से खरीद लूँ,
जैसे सब खरीदते हैं...
फिर कुछ पल सोचने के बाद
मैंने मन बना लिया
कि ख़ुद ही बुनूँगा इसको मैं,
और 2 सलाईयाँ लेकर शुरू किया बुनना...
ऊन का कुछ अंदाज़ा नहीं था,
ऊन ख़त्म हो गयी और स्वेटर अभी
आधा भी नहीं था,
सोचा अगली ऊन खरीदने से पहले
क्यों न अपनों से उनकी पसंद का रंग पूछ लूँ
और उसको भी इस स्वेटर में शामिल कर लूँ,
और फिर सिलसिला शुरू हुआ सबकी पसंद के रंगों का...
मैं सबके मन को रखता हुआ
हर किसी की पसंद के रंग की ऊन लेकर
जोड़ता गया अपने स्वेटर में,
और समय आ ही गया जब मेरा स्वेटर बनकर तैयार था...
सोचा, क्यों ना इस रंग बिरंगे
सबकी पसंद के रंगो वाले स्वेटर को पहनू
और जानूँ के कैसा है ये,
यही सोच लेकर निकल पड़ा उन्हीं अपनों के पास...
जिसने भी मेरा स्वेटर देखा वो खुश तो हुआ
मगर मज़ाक बनाने के अंदाज़ में,
और बस एक ही बात बोली-
"ये बेमेल रंगो का मेल तुम्हें कैसे सूझा?"
मैंने सीधे जवाब में कह दिया-
"इसमें मेरे सब अपनों की पसंद का एक-एक रंग लगा है..."
तो जवाब आया-
"भला कोई ज़िन्दगी में सबको खुश रख पाया है क्या?"
सत्य सुनकर अजीब सा लगा, मगर
शायद वो बात कटु सत्य थी...
मैंने उस स्वेटर को ना फेंका,
ना फाड़ा, ना जलाया
बल्कि एक सबक मान कर रख दिया
एक हेंगर में टांग कर अपने कमरे में...
आज जब भी मुझसे कोई रूठता है
तो मैं उस स्वेटर को देखता हूँ
और याद कर लेता हूँ कि जब एक स्वेटर में
सबकी पसंद के रंग डालने के बाद वो बेमेल हो गया,
तो भला ज़िन्दगी में सबको खुश रखना
उस बेमेल स्वेटर को पहनकर
अपना ही मज़ाक बनवाने से ज़्यादा
कुछ नहीं है,
कुछ भी नहीं है…

-अमित असीम

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